आजा बचपन फिर से आजा
आजा बचपन फिर से आजा -2, जब मेरे पहले पैर कभी तेरी दुनिया में आया था। लल्ली मुन्नी बहना कह कर सबने ही प्यार जाता था। जब मुझको इतना नेह ना था इस पैसे और रुपैया में, मैया से तो मेरी जिद्दी थी बिट्ठलादे ऊँट कुल्हिया में। तब द्वेष भाव का नाम न था मेरे पावन वो पल आजा, आजा बचपन फिर से आजा। जब जलते दीपक की लो मेरी भी लग जाती थी, तब मुझसे बातें करने को सबकी वाणी बतलाती थी। नभ में तारे आते ही मैं बिस्त्तर पर सो जाती थी, फिर प्यार भरा चुम्बन मुझको सूरज के बाद जागता था। प्रातः चुल्लू भर पानी में माँ रोज बनती थी राजा, आजा बचपन फिर से आजा। खटिया पे खेलती थी, ले रोटी का टुकड़ा कर में, कर काव-2 झपटा करता कोआ रोटी क्षड्ड भर में, जन्नी धमाका करती थी, खा ले वरना खा जाउंगी, जो अबकी बार रोई तनिक, रामू की मां बन जाऊंगी। मां प्यार जताया करती थी, आजा रे हौआ तू खाजा, आजा बचपन फिर से आजा। मैं देख पराई नई वस्तु, रोया चिल्लाया करती थी, चिड़िया ले गई कह देने पर, फिर खुश हो जया करती थी, अब वो मेरे सोने से दिन, उड़ कहा गई चिड़िया लेकर, राजा से रेक बनाया है, मेरे जीवन का धन लेकर। वो गीत नया कर जा फिर से, आजा रे चंदा मामा तू आजा, आजा बचपन फिर से आजा। जब बंदर वाला आकर के बंदर नचवाया करता था, ससुराल बंदरिया बंदर के संग, हस-२ भाईजवाया करता था। जब उसका खेल नहीं बदले तो सेंस तू बदल गया, बंधन की बेदी पेरो में बचपन का मन आ मार दिया। वो खेल नया करजा फिर से आजा वो क्षड्ड फिर आजा ,
आजा बचपन फिर से आजा। k.p chandel

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