मंजिल की चाह
"जो देखता है सपने, अपनी मंजिल सजाने का, उस पर समाज के रीति-रिवाजों का , कोई फर्क नहीं पड़ता। चाहता है लूट लू खजाना ज्ञान का, आधे अधूरे ज्ञान पर वह सब्र नहीं करता " क्षमा चंदेल
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